राजनीति से धर्म को दूर रखना चाहिए, यह एक अर्थहीन वाक्य है। क्योंकि धर्म शब्द रिलिजन का पर्यायवाची शब्द नहीं है। इसे जाने बिना हम इस प्रकार बोलते आये हैं। यह कितना असम्बद्ध विचार है?
आगे देखेंगे।
दो प्रकार के वाक्यों को रखकर प्रवेश करेंगे।
1. राजनीति से धर्म को दूर रखना चाहिए। हिन्दू धर्म में अमानवीय कुरीतियाँ भरी पड़ी हैं। धर्म शोषण का साधन बना है। इन उपरोक्त वाक्यों को ग्रन्थों में तथा अखबारों में पाया जाना आम बात है।
2. इसके साथ आगे के वाक्यों की तुलना कीजिए। जैसे “वह धर्मात्मा है। सृष्टि पर बढ़ते अधर्म के कारण समय–समय पर बारिश नहीं होती, फसल नहीं आती।” दया ही धर्म का मूल है, ‘धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे–युगे‘ आदि।
उपरोक्त दो प्रकार के वाक्य विभिन्न सन्दर्भो की सूची है। पहला, आधुनिक सन्दर्भ को सूचित करता है। यहाँ स्पष्टतः रिलिजन के पर्यायवाची के रूप में धर्म शब्द का उपयोग किया गया है। इस प्रकार के वाक्यों को राजनीतिक लोग, समाजविज्ञानी और प्रगतिवादी कहलाने वाले चिन्तक बोलते रहते हैं। दूसरा हमारा साम्प्रदायिक सन्दर्भ है। हमारे इर्द–गिर्द के अपने लोग और सम्प्रदाय के लोग इसका इस्तेमाल करते हैं। इन लोगों की बातचीत में धर्म इसका सही अर्थ ‘भला‘ अथवा ‘करने लायक‘ ऐसा निकलता है। धर्म किसे कहें?, अधर्म किसे कहें? हमारे सम्प्रदाय ही हमें सिखाते हैं कि काल, देश, व्यक्ति के साथ सन्दर्भ को देखकर निर्णय करना चाहिए।
मेरे मुताबिक पहले किस्म के वाक्य में धर्म को रिलिजन के पर्यायवाची अर्थ में लिया गया है; वह भाषांतर होते हुए भी निरर्थक शब्द है। इसी कारण उस निरर्थक रिलिजन शब्द से बनने वाला वाक्य भी निरर्थक है। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे आधुनिक चिन्तक इस प्रकार के वाक्य का प्रयोग करते वक्त अर्थहीन बातें करते रहते हैं। एक उदाहरण देकर इस बात को स्पष्ट कर देता हूँ। जैसे आये दिन कहा जाता है कि ‘राजनीति से धर्म को दूर रखना‘ चाहिए। यह बात आम-तौर पर प्रगतिवादियों द्वारा कही जाती है। परन्तु ये अर्थहीन अलाप है। क्यों?
आज सांप्रदायिक लोगों के अनुसार धर्म शब्द का अर्थ ‘भला‘ या ‘भलाई‘, अच्छा काम करना आदि है। किसी भारतीय से पूछिए तो वह कहेगा कि धर्म का मतलब ऐसा कर्तव्य है, जिसे करना ही चाहिए या फिर किसी की भलाई करना है। उदाहरण के लिए दान देना, दुःख में रहने वाले की सहायता करना आदि। भारतीय लिखित परम्परा की छानबीन करने पर यही अर्थ निकलता है। धर्म का मतलब भलाई, अधर्म का मतलब बुराई है। परन्तु राजनीतिक लोग प्रगतिवादी कहलाये जानेवाले चिन्तक भाषण करते समय, लिखते समय यों कहिए कि मौके–बेमौके लिखते और बोलते रहते हैं कि राजनीति में धर्म नहीं रहना चाहिए। राजनीति से धर्म को दूर हटाने वाली बात को लेकर ये लोग हंगामा मचाते हैं कि यह कोई मौलिक मुद्दा नहीं है। लोगों के अनुभव की दृष्टि से धर्म को राजनीति से दूर रखने का मतलब है कि राजनीति में अच्छा काम नहीं करना। यह बिल्कुल मजे की बात है, लोग ठहाका मारकर हँसेंगे कि नहीं? फिर भी राजनीतिक, प्रगतिवादी कहलाने वाले लोग ऐसे बोलते ही रहते हैं। यह बात विचित्र होते हुए भी सच है कि नहीं ?
हम इसे कैसे समझें? लोगों को यह अटपटी बात कैसे समझ में आयी होगी? वे क्या समझे होंगे? प्रायः उन लोगों को यह बात अटपटी लगने के कारण वे इस प्रकार के वाक्यों की उपेक्षा करके छोड़ देते हैं। अथवा उनको यह बात समझ में ही नहीं आयी होगी? मेरे ख्याल से राजनीतिक व पढ़े–लिखे लोगों की समझ में यह बात नहीं आयी होगी कि ‘धर्म को राजनीति से हटा देना‘ वाक्य का क्या अर्थ है?
लोगों को उलझन में धकेलने वाले राजनीति और धर्म का वाक्य ‘Religion ought to be separated from Politics’ का अनुवाद है। अंग्रेजी में यह वाक्य सेक्युलर प्रभुत्व का आधार स्तंभ है। इसका अर्थ है रिलिजन नामक संस्था अथवा चर्च को राजनीति से दूर रखना। हमारे राजनीतिक लोग इस अंग्रेजी वाक्य को देसी भाषा में अनुवाद करके बोलते रहते हैं। यदि रिलिजन का अर्थ मालूम हो जाय तो उपरोक्त दोनों सन्दर्भ में उन शब्दों का अर्थ कितना अटपटा लगता है? अगले भाग में इसकी चर्चा करेंगे।
‘रिलिजन‘ के अर्थ में धर्म का उपयोग जो करते हैं, उन्हें रिलिजन शब्द का अर्थ मालूम ही नहीं है। ऐसा वाक्य किन सन्दर्भो में सुनने को मिलता है? जैसे राम जन्मभूमि के सन्दर्भ में भाजपा वालों के विरुद्ध सेक्युलर चिन्तकों ने इसको अस्त्र रूप में उपयोग किया है। सेक्युलर चिन्तकों ने रिलिजन और धर्म को एक समझ कर दावा किया है कि, राजनीति से धर्म को दूर रखना। समस्या यही उद्भव होती है। ये लोग भारत में हिन्दुओं का रिलिजन ‘हिन्दू धर्म‘ है समझकर ही इस प्रकार वितंडवाद करते नजर आते हैं। सेक्युलर चिन्तक हमारे मंत्री महोदय का यज्ञ करवाना, मठ-मन्दिर जाना, मठ-मन्दिर को दान देना, कचहरी में विशेष पूजा करवाना, इष्टदेव की तस्वीर रखकर धूप–दीप करना आदि को रिलिजन और राजनीति के मिलन के उदाहरण के तौर पर देते हैं। इन उदाहरणों के द्वारा ये लोग दावा करते हैं कि ब्राह्मण पुरोहितशाही और मठ के महंत लोग इन आचरणों के द्वारा ही राजनीति में अपना अधिकार जमाते हैं।
यदि किसी को ‘रिलिजन‘ शब्द का सही अर्थ मालूम हो जाय तो वे इस प्रकार के आचरणों को रिलिजन नहीं कह सकते। रोमन साम्राज्य के पतन के उपरांत क्रिश्चियनिटी ने कैथोलिक चर्च के अधिकार द्वारा पूरे यूरोप के राज्यों को अपने काबू में कर लिया। क्रिश्चियनिटी ने ऐसा दावा किया था कि चर्च का शासन दैवी शासन है, सृजनहार ही सर्वतंत्र और सार्वभौम है, वही शाश्वत एवं सत्य है। मनुष्य और इस भूमि की सृष्टि गॉड द्वारा ही हुई है। गॉड ने अपने उद्देश्य पूर्ति के लिए ही इस संसार का सृजन किया है। इसीलिए मनुष्यों को राजा एवं शासन के अधीन रहना चाहिए, यही अन्तिम सत्य है। इस प्रकार प्रतिपादन करते हुए वह अपने को सही रिलिजन कहकर समर्थन करते हैं। इसीलिए ‘राज्य‘ क्रैस्त तत्त्वों का प्रतिपादन करें तथा इन्हें आचरण में लाने के लौकिक साधन बने। करीबन एक हजार साल तक यूरोप की राजनीति इसी प्रकार चलती आयी।
आधुनिक काल में यूरोप के क्रैस्तमत में दरार पड गयी।उनमें अभिप्राय भेद शुरू हुआ कि बाइबिल के अनुसार कौन–सा रिलिजन सही है? हर धार्मिक पंत ने दावा किया कि उनका रिलिजन ही परम सत्य है और अन्य पंथ मिथ्या हैं। एक ही प्रभुत्व के अधीन इन विभिन्न पंथों के अनुयायी लोग थे। उनके अपने–अपने चर्च थे। उपरोक्त सन्दर्भ में राज्य किस पंथ को सही कहकर मान्यता दे सकेगा? यदि नये पंथ जो हैं, वे बाइबिल, गॉड आदि का निराकरण करें तो यह समस्या उद्भव नहीं होती होगी।
सभी पंथ के लोग एक ही गॉड को मानते हैं। बाइबिल ही उनकी देववाणी का ग्रन्थ है, क्रिस्त उसके प्रवादि हैं। परन्तु बाइबिल में जो कहा गया, उसके प्रति भिन्न मत है। यह समस्या उलझन बनी। जिस क्रैस्त सत्य को आधार बनाकर यूरोप्य में प्रभुत्व रूपायित हुआ, उसी से उपजी यह समस्या बढ़ गयी। यह रिलिजन के अन्यान्य पंथों के लिए केवल सत्य से सम्बन्धित विवाद था जबकी क्रैस्त प्रभुत्वों के लिए यह एक व्यावहारिक प्रश्न था।
इस कठिन परिस्थिति से बाहर आने के लिए उन्होंने जो उपाय निकाला वही सेक्युलरनीति है। इन रिलिजन की सत्यता को प्रमाणित करना ना–मुमकिन है। इसीलिए राज्य ने उस संकट से मुक्त होने के लिए एक निर्णय लिया कि उन सभी पंथों एवं उनके प्रतिपादनों को समान रीति से राज्य से दूर रखना इस पेचीदा समस्या से बाहर आने का एक ही मार्ग है। रिलिजन (चर्च) के अधिकार से परे एक (Domain) है? जिसे सेक्युलर Domain बोलते हैं, जिसमें sovereign की परिकल्पना एवं कानून (Law) रूपायित हो। इस नीति को सेक्युलरनीति बोलते हैं। इस तरह यूरोप के राजनीतिज्ञों ने सेक्युलर नीति पर एक बौद्धिक वाद निर्माण किया।
उपरोक्त सन्दर्भ में ‘रिलिजन को राजनीति से दूर रखना चाहिए, वाली चर्चा शुरू हुई। यहाँ रिलिजन शब्द चर्च और उसके अधिकार व्याप्ति का सूचक है तथा निर्दिष्ट ऐतिहासिक घटना भी इनमें निहित है। एक ही सही सृजनहार, एक ही सत्य ग्रन्थ, एक ही प्रवादि, इस प्रकार दावा करने वाली संस्था को ‘रिलिजन‘ नाम से जाना जाता है। उपरोक्त दृष्टि से देखा जाय तो भारत में ऐसा ‘रिलिजन‘ ही नहीं है। उपरोक्त उल्लेखित भारतीय आचरण जो हैं वो रिलिजन से सम्बन्धित नहीं हैं।
धर्म नामक देसी शब्द और अर्थ को लिया जाय तो आजकल राजनीतिक लोग जो धर्माचरण के प्रति दोषारोपण करते हैं; वह झूठा सिद्ध होगा। यह स्पष्ट होगा कि धर्म और रिलिजन भिन्न प्रभेद हैं। हमारे सम्प्रदाय ने यह लिखकर नहीं दिया कि यह धर्म है या अधर्म। इतना ही नहीं धर्म और अधर्म का निर्णय करने वाले कोई सिद्ध सूत्रों एवं डॉक्ट्रिन भी हमारे यहाँ नहीं हैं। आश्चर्य की बात यह है कि यदि कोई पूछे कि नारियल फोड़ना, तिलक व भस्म धारण करना धर्म है या अधर्म? उत्तर होगा कि वह काल, देश, व्यक्ति के अनुसार निर्णय होगा। इसीलिए हमारे साम्प्रदायिक अर्थ की दृष्टि से देखा जाय तो भी धर्म को राजनीति से अलग करने वाली बात अटपटी लगेगी।
इस तरह धर्म को रिलिजन से दूर रखने वाली बात देसी अर्थ में ऐसी प्रतीत होती है कि राजनीति भला काम कदाचित नहीं करेगी, और यदि रिलिजन शब्द का सही अर्थ पता हो जाय तो हमारे आधुनिक चिन्तकों के होश उड़ जायेंगे। सवाल उठता है कि वे अन्य किसी अर्थ को लगाकर इस प्रकार बोलते हैं क्या? उसका भी उत्तर नहीं मिलता है। यह सिद्ध होता है कि हम कुछ बेमतलब की बात बोल रहे हैं।



